अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
मूल पाठ
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
स्रोत अभिलेख 3.8 · पुस्तक पृ. 629, 630
भावार्थ
मूल पाठ के बादतबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूँ। अब (आज) प्रभुको देखकर मेरी छाती शीतल हो गयी। हे नाथ! मैं सब साधनोंसे हीन हूँ। आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 629 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
English explanation
I kept watching for you day and night; now, seeing the Lord, my heart has found relief.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चितवत | देखता हुआ | watching |
| पंथ | राह | the path |
| रहेउँ | मैं रहा | I remained |
| दिन | दिन | day |
| राती | रात | night |
| अब | अब | now |
| प्रभु | प्रभु राम को | Lord Rama |
| देखि | देखकर | having seen |
| जुड़ानी | शीतल हो गई | was soothed |
| छाती | छाती अर्थात हृदय | my breast, meaning my heart |
2 नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
English explanation
O Lord, I lack all means of spiritual practice; knowing me as your humble servant, you showed me grace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| सकल | सभी | all |
| साधन | साधना के साधनों से | means of spiritual practice |
| मैं | मैं | I |
| हीना | रहित हूँ | am devoid of |
| कीन्ही | आपने की | you bestowed |
| कृपा | कृपा | grace |
| जानि | जानकर | recognizing |
| जन | अपने सेवक को | your servant |
| दीना | दीन | humble and helpless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.8
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 629
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध-वध और शरभङ्ग-प्रसङ्ग
- मुद्रित पृष्ठ
- 629, 630
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।