अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।
मूल पाठ
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
स्रोत अभिलेख 3.15 · पुस्तक पृ. 639, 640
भावार्थ
मूल पाठ के बादज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है। हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो॥ ४॥ [जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवाका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मनका निगृहीत न होना, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा- व्याधिमय जगत्में सुखबुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदिमें आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक, भक्तिका अभाव, एकान्तमें मन न लगना, विषयी मनुष्योंके संगमें प्रेम—ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके अर्थ (तत्त्वज्ञानके द्वारा जाननेयोग्य) परमात्माका नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिये गीता अध्याय १३। ७ से ११]
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 640 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।
English explanation
Knowledge is where not even a trace of pride and the like remains, and where Brahman is seen equally in all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ग्यान | ज्ञान | true knowledge |
| मान | अभिमान | pride |
| जहँ | जहाँ | where |
| एकउ | एक भी | even one |
| नाहीं | नहीं है | is absent |
| देख | देखता है; दर्शन करता है | sees; beholds |
| ब्रह्म | ब्रह्म; परम सत्य | Brahman, ultimate reality |
| समान | समान रूप से | equally |
| सब | सबमें | in all |
| माही | में; भीतर | within |
2 कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
English explanation
Dear Lakshmana, one is called supremely detached who discards extraordinary powers and the three qualities of nature as mere straw.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहिअ | कहा जाता है | is called |
| तात | हे प्रिय लक्ष्मण | dear Lakshmana |
| सो | वह | that person |
| परम | अत्यंत; सर्वोच्च | supremely |
| बिरागी | वैराग्यवान; आसक्तिरहित | detached; free from attachment |
| तृन | तिनका | straw |
| सम | के समान | like |
| सिद्धि | अलौकिक सिद्धियाँ | extraordinary spiritual powers |
| तीनि | तीनों | all three |
| गुन | सत्त्व, रज और तम गुण | the qualities of goodness, activity, and inertia |
| त्यागी | त्यागने वाला | one who renounces |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.15
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 640
- सहायक विषय
- पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 639, 640
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।