अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
मूल पाठ
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।
स्रोत अभिलेख 3.15 · पुस्तक पृ. 639, 640
भावार्थ
मूल पाठ के बादएक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दु:खरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है। और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 639 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
English explanation
One form, avidya, is harmful and intensely sorrowful; under its sway, the individual being lies fallen in the well of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | एक रूप, अविद्या | one form, avidya |
| दुष्ट | दुष्ट; अनिष्टकारी | evil; harmful |
| अतिसय | अत्यंत | exceedingly |
| दुखरूपा | दुखस्वरूप | embodying suffering |
| जा | जिसके | whose |
| बस | वश में | under the sway |
| जीव | जीव | the individual being |
| परा | पड़ा; गिरा हुआ है | lies fallen |
| भवकूपा | संसाररूपी कुएँ में | in the well of worldly existence |
2 एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।
English explanation
The other form, vidya, creates the world and holds the qualities of nature under its sway; it is impelled by the Lord and has no independent power of its own.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | दूसरा रूप, विद्या | the other form, vidya |
| रचइ | रचता है | creates |
| जग | जगत | the world |
| गुन | प्रकृति के गुण | the qualities of nature |
| बस | वश में | under control |
| जाकें | जिसके | whose |
| प्रभु | प्रभु द्वारा | by the Lord |
| प्रेरित | प्रेरित; संचालित | impelled; directed |
| नहिं | नहीं है | there is no |
| निज | अपना; स्वतंत्र | its own; independent |
| बल | बल | power |
| ताकें | उसका | its |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.15
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 639
- सहायक विषय
- पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 639, 640
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।