अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
मूल पाठ
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
स्रोत अभिलेख 3.34 · पुस्तक पृ. 666, 666
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीरामजीने अपना धर्म (भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणोंमें प्रेम देखकर वह उनके मनको भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्वका स्वरूप) पाकर आकाशमें चला गया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 666 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
English explanation
Rama explained his own duty to him; seeing his love for Rama’s feet, Rama found him pleasing at heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | कहकर | having stated |
| निज | उसका अपना | his own |
| धर्म | धर्म अथवा कर्तव्य | duty or proper conduct |
| ताहि | उसे | to him |
| समुझावा | समझाया | explained |
| निज | अपने | his own |
| पद | चरणों में | for the feet |
| प्रीति | प्रेम | love |
| देखि | देखकर | seeing |
| मन | मन को | to the heart |
| भावा | प्रिय लगा | was pleasing |
2 रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
English explanation
Bowing his head at Rama’s lotus feet, he attained his destined state and departed into the sky.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम के | of Rama, lord of Raghu’s lineage |
| चरन | चरण | feet |
| कमल | कमल जैसे | lotus-like |
| सिरु | सिर | head |
| नाई | झुकाकर | having bowed |
| गयउ | चला गया | departed |
| गगन | आकाश में | into the sky |
| आपनि | अपनी | his own |
| गति | प्राप्त होने वाली अवस्था | destined state |
| पाई | पाकर | having attained |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.34
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 666
- सहायक विषय
- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश और पम्पासरकी ओर प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 666, 666
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