अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दयद्यपि मैं आपके ऐसे रूपको जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्ममें (आपके इस सुन्दर स्वरूपमें) ही प्रेम मानता हूँ। आप सेवकोंको सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसीसे हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 638 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।
स्रोत अभिलेख 3.13 · पुस्तक पृ. 637, 638
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
English explanation
I know and describe your nature thus, yet again and again I delight in loving Brahman in your personal, attributed form.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus; such |
| तव | आपका | your |
| रूप | रूप; स्वरूप | nature; form |
| बखानउँ | मैं वर्णन करता हूँ | I describe |
| जानउँ | मैं जानता हूँ | I know |
| फिरि | फिर | again |
| फिरि | फिर | again |
| सगुन | गुणों और रूप से युक्त | with attributes and form |
| ब्रह्म | ब्रह्म; परम सत्य | Brahman; ultimate reality |
| रति | प्रेम; अनुराग | love; affection |
| मानउँ | मैं आनंद मानता हूँ | I delight in |
2 संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।
English explanation
You always honor your servants; that is why, Lord of Raghu’s lineage, you asked me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संतत | सदा | always |
| दासन्ह | सेवकों को | to your servants |
| देहु | देते हैं | give |
| बड़ाई | सम्मान; प्रतिष्ठा | honor; distinction |
| तातें | इसलिए | therefore |
| मोहि | मुझसे | me |
| पूँछेहु | आपने पूछा | you asked |
| रघुराई | हे रघुवंश के स्वामी राम | O Rama, lord of Raghu’s lineage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.13
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 638
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 637, 638
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।