अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
मूल पाठ
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
स्रोत अभिलेख 3.27 · पुस्तक पृ. 655, 656
भावार्थ
मूल पाठ के बादसुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामजीने उसके हृदयके प्रेमको पहचानकर उसे वह गति (अपना परमपद) दी जो मुनियोंको भी दुर्लभ है॥ ९॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 656 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
English explanation
The discerning Rama recognized the love within him and granted him a spiritual destination rare even for sages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अंतर | भीतर का | within |
| प्रेम | प्रेम | love |
| तासु | उसका; मारीच का | his; Maricha’s |
| पहिचाना | पहचान लिया | recognized |
| मुनि | मुनियों के लिए | for sages |
| दुर्लभ | दुर्लभ | hard to attain |
| गति | आध्यात्मिक गति; परम स्थिति | spiritual destination; blessed state |
| दीन्हि | प्रदान की | granted |
| सुजाना | सुजान राम ने | the discerning Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.27
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 656
- सहायक विषय
- मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 655, 656
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।