सुन्दरकाण्ड · दोहा 57 · दोहा/सोरठा
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.57 · पुस्तक पृ. 765, 766
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
जड़ समुद्र विनय नहीं मान रहा था; तीन दिन बीत गए।
English explanation
The unresponsive ocean did not heed the entreaty; three days passed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनय | विनय; नम्र प्रार्थना | humble entreaty |
| न | नहीं | not |
| मानत | मानता; स्वीकार करता | heeds; accepts |
| जलधि | समुद्र | ocean |
| जड़ | जड़; संवेदनहीन | insentient; unresponsive |
| गए | गए | had gone |
| तीन | तीन | three |
| दिन | दिन | days |
| बीति | बीतकर | by; elapsed |
2 बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
तब राम क्रोध सहित बोले, ‘भय के बिना प्रीति नहीं होती।’
English explanation
Then Rama said angrily, ‘Without fear, affection does not arise.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोले | बोले | said |
| राम | राम | Rama |
| सकोप | क्रोध सहित | with anger |
| तब | तब | then |
| भय | भय | fear |
| बिनु | बिना | without |
| होइ | होती है | arises |
| न | नहीं | not |
| प्रीति | प्रीति; स्नेह | affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 57
- स्रोत अभिलेख
- 5.57
- सहायक विषय
- दूतका रावणको समझाना और लक्ष्मणजीका पत्र देना
- मुद्रित पृष्ठ
- 765, 766
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।