लङ्काकाण्ड · दोहा 117 (क) · दोहा
मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥ ११७ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.117 · पुस्तक पृ. 897, 898
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
जिन्हें मुनि ध्यान से भी नहीं पा सकते और वेद ‘यह नहीं, यह नहीं’ कहते हैं—
English explanation
He whom sages cannot attain even through meditation, and whom the Vedas describe as ‘not this, not this’—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि; ऋषिगण | sages |
| जेहि | जिन्हें | whom |
| ध्यान | ध्यान के द्वारा | through meditation |
| न | नहीं | not |
| पावहिं | पा सकते हैं | can attain |
| नेति | यह नहीं | not this |
| नेति | यह नहीं | not this |
| कह | कहते हैं | say |
| बेद | वेद | the Vedas |
2कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥ ११७ (क)॥
वही कृपा के सागर राम वानरों के साथ अनेक विनोद कर रहे हैं।
English explanation
That very Rama, the ocean of compassion, is engaging in many playful pastimes with the monkeys.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | कृपा के सागर राम | Rama, the ocean of compassion |
| सोइ | वही | that very one |
| कपिन्ह | वानरों के | the monkeys |
| सन | साथ | with |
| करत | कर रहे हैं | is engaging in |
| अनेक | अनेक | many |
| बिनोद | विनोद; खेल-कौतुक | playful pastimes |
| क | पद्य-संदर्भ का उपभाग ‘क’ | verse-reference subdivision ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 117 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 6.117
- सहायक विषय
- विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओंका उन्हें पहनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 897, 898
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।