लङ्काकाण्ड · दोहा 118 (ग) · दोहा
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥ ११८ (ग)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.118 · पुस्तक पृ. 898, 899
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
प्रेम के वश वे कुछ कह नहीं सकते; उनकी आँखें बार-बार आँसुओं से भर आती हैं।
English explanation
Overcome by love, they cannot say anything; their eyes repeatedly fill with tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | कह | say |
| न | नहीं | not |
| सकहिं | वे सकते हैं | they can |
| कछु | कुछ भी | anything |
| प्रेम | प्रेम के | of love |
| बस | वश में | under the sway |
| भरि | भरकर | filling |
| भरि | बार-बार भरकर | filling again and again |
| लोचन | आँखें | eyes |
| बारि | आँसुओं का जल | tears |
2सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥ ११८ (ग)॥
वे सामने स्थित राम के शरीर को देखते हैं, आँखों का पलक झपकना रोककर।
English explanation
They gaze at Rama’s figure before them, keeping their eyes from blinking.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सन्मुख | सामने | before them |
| चितवहिं | वे निहारते हैं | they gaze at |
| राम | राम के | Rama’s |
| तन | शरीर को | figure |
| नयन | आँखों का | of the eyes |
| निमेष | पलक झपकना | blinking |
| निवारि | रोककर | having restrained |
| ग | पद-संदर्भ का चिह्न (ग) | verse reference marker (c) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 118 (ग)
- स्रोत अभिलेख
- 6.118
- सहायक विषय
- विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओंका उन्हें पहनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 898, 899
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।