लङ्काकाण्ड · छंद · छंद
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
मूल पाठ
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥
धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥
स्रोत अभिलेख 6.81 · पुस्तक पृ. 852, 852
भावार्थ
मूल पाठ के बादवे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतडिय़ाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हंै मानो प्रह्लादके स्वामी श्रीनृसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वज्र और वज्रसे तृण कर देते हैं (निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं)॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 853 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
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2प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
3धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
4जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 6.81
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 853
- सहायक विषय
- रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय-रथ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 852, 852
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।