लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दबाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला। फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया। तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 865 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका।।
स्रोत अभिलेख 6.92 · पुस्तक पृ. 865, 866
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
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2 रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.92
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 865
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 865, 866
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।