लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दनवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 823 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।।
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।
स्रोत अभिलेख 6.53 · पुस्तक पृ. 823, 824
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।।
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2 देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.53
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 823
- सहायक विषय
- माल्यवान्का रावणको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 823, 824
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