बालकाण्ड · दोहा 196 · दोहा/सोरठा
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.196 · पुस्तक पृ. 196, 196
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
सबके मन संतुष्ट हो गए; वे जहाँ-तहाँ आशीर्वाद देते हैं।
English explanation
Everyone’s heart was satisfied; everywhere they offered blessings.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मन | मन | hearts |
| संतोषे | संतुष्ट हुए | were satisfied |
| सबन्हि | सभी | everyone |
| के | के | of |
| जहँ | जहाँ | where |
| तहँ | तहाँ; वहाँ | there |
| देहि | देते हैं | give |
| असीस | आशीर्वाद | blessings |
2 सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।
सभी पुत्र दीर्घायु हों—तुलसीदास के प्रभु भी।
English explanation
May all the sons live long—including the Lord of Tulsidas.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | सभी | all |
| तनय | पुत्र | sons |
| चिर | दीर्घ काल तक | for a long time |
| जीवहुँ | जीवित रहो | may you live |
| तुलसिदास | कवि तुलसीदास | the poet Tulsidas |
| के | के | of |
| ईस | प्रभु, राम | Lord Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 196
- स्रोत अभिलेख
- 1.196
- सहायक विषय
- श्रीभगवान्का प्राकट्य और बाललीलाका आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 196, 196
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