बालकाण्ड · दोहा 218 · दोहा/सोरठा
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.218 · पुस्तक पृ. 215, 216
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
सुख के भंडार दोनों भाइयो, जाओ, नगर देखकर लौट आओ।
English explanation
Both brothers, treasures of happiness, go see the city and return.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाइ | जाकर | having gone |
| देखी | देखकर | having seen |
| आवहु | लौट आओ | return |
| नगरु | नगर को | the city |
| सुख | सुख के | of happiness |
| निधान | भंडार | treasures |
| दोउ | दोनों | both |
| भाइ | भाइयो | brothers |
2 करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
अपने सुंदर मुख दिखाकर सबके नेत्रों को सार्थक करो।
English explanation
Make everyone’s eyes blessed by showing them your beautiful faces.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करहु | करो | make |
| सुफल | सार्थक | fulfilled or blessed |
| सब | सब | everyone |
| के | के | of |
| नयन | नेत्र | eyes |
| सुंदर | सुंदर | beautiful |
| बदन | मुख | faces |
| देखाइ | दिखाकर | by showing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 218
- स्रोत अभिलेख
- 1.218
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
- मुद्रित पृष्ठ
- 215, 216
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।