बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।
मूल पाठ
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।
स्रोत अभिलेख 1.259 · पुस्तक पृ. 250, 251
भावार्थ
मूल पाठ के बादप्रभुकी ओर देखकर सीताजीने शरीरके द्वारा प्रेम ठान लिया (अर्थात् यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हींका होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं)। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजीको देखकर धनुषकी ओर कैसे ताका, जैसे गरुडज़ी छोटे-से साँपकी ओर देखते हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 251 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।
English explanation
Looking toward the Lord, Sita held love firmly within herself; Rama, the treasury of compassion, understood it all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम की | of Lord Rama |
| तन | ओर | toward |
| चितइ | देखकर | looking |
| प्रेम | प्रेम | love |
| तन | तन में; अपने भीतर | in her body; within herself |
| ठाना | दृढ़ किया; स्थापित किया | established firmly |
| कृपानिधान | कृपा के भंडार | treasury of compassion |
| राम | श्रीराम | Rama |
| सबु | सब कुछ | everything |
| जाना | जान गए | understood |
2 सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।
English explanation
After looking at Sita, Rama eyed the bow as Garuda eyes a small snake.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सियहि | सीता को | Sita |
| बिलोकि | देखकर | having looked at |
| तकेउ | निहारा | eyed |
| धनु | धनुष को | the bow |
| कैसे | किस प्रकार; ऐसे | in what manner; thus |
| चितव | देखते हैं | looks at |
| गरुरु | गरुड़, विष्णु के पक्षीरूप वाहन | Garuda, Vishnu’s bird mount |
| लघु | छोटे | small |
| ब्यालहि | साँप को | a snake |
| जैसे | जैसे | just as |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.259
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 251
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 250, 251
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