अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।
मूल पाठ
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।
हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।
स्रोत अभिलेख 2.163 · पुस्तक पृ. 478, 479
भावार्थ
मूल पाठ के बादउसे [सजी] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोधमें भर गये। मानो जलती हुई आगको घीकी आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोरसे तककर कूबड़पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 479 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।
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2 हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.163
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 479
- सहायक विषय
- श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन और शोक
- मुद्रित पृष्ठ
- 478, 479
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