अरण्यकाण्ड · श्लोक · श्लोक
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
मूल पाठ
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं
वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥१॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 619, 620
भावार्थ
मूल पाठ के बादधर्मरूपी वृक्षके मूल, विवेकरूपी समुद्रको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमलके [विकसित करनेवाले] सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकारको निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापोंको हरनेवाले, मोहरूपी बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न करनेकी विधि (क्रिया)-में आकाशसे उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्माजीके वंशज (आत्मज) तथा कलङ्कनाशक महाराज श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 619 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं
English explanation
I bow to the community of Brahmins, the root of the tree of righteousness, the full moon for the ocean of discernment, and a giver of joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मूलं | जड़; आधार | root; foundation |
| धर्मतरोर्विवेकजलधेः | धर्मरूपी वृक्ष की; विवेकरूपी समुद्र के | of the tree of righteousness; of the ocean of discernment |
| पूर्णेन्दुमानन्ददं | पूर्ण चंद्र; आनंद देने वाला | a full moon; a giver of joy |
2वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।
English explanation
I bow to that community, the sun that opens the lotus of detachment, indeed dispelling the dense darkness of sin and removing suffering.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| वैराग्याम्बुजभास्करं | वैराग्यरूपी कमल के लिए सूर्य | the sun for the lotus of detachment |
| ह्यघघनध्वान्तापहं | निश्चय ही पाप के घने अंधकार को दूर करने वाला | indeed, a dispeller of the dense darkness of sin |
| तापहम् | संताप दूर करने वाला | a remover of suffering |
3मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं
English explanation
I bow to that community of Brahmins, like wind in scattering the masses of clouds of delusion, and a bringer of well-being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ | मोह के मेघसमूहों को छिन्न-भिन्न करने के कार्य में | in the work of scattering masses of clouds of delusion |
| स्वःसम्भवं | आकाश से उत्पन्न वायु के समान | like wind arising from the sky |
| शङ्करं | कल्याण करने वाला | a bringer of well-being |
4वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥१॥
English explanation
I bow to the community of Brahmins, which removes blemishes and is dear to King Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| वन्दे | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow to |
| ब्रह्मकुलं | ब्राह्मण-समुदाय को | the community of Brahmins |
| कलङ्कशमनं | कलंक या दोष मिटाने वाला | one that removes blemishes or faults |
| श्रीरामभूपप्रियम् | राजा श्रीराम को प्रिय | dear to King Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 619
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 619, 620
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।