अरण्यकाण्ड · दोहा 21 (ख) · दोहा/सोरठा
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.21 · पुस्तक पृ. 649, 650
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
सभा के बीच गिरकर, व्याकुल होकर, वह रोते हुए अनेक प्रकार से कहती है।
English explanation
Falling in the midst of the assembly, distraught, she speaks in many ways while weeping.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सभा | सभा | assembly |
| माझ | बीच में | in the midst of |
| परि | गिरकर | having fallen |
| ब्याकुल | व्याकुल | distraught |
| बहु | बहुत, अनेक | many |
| प्रकार | प्रकार से | ways |
| कह | कहती है | says |
| रोइ | रोते हुए | weeping |
2 तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
हे दस सिर वाले रावण, तुम्हारे जीते-जी क्या मेरी ऐसी दुर्दशा होनी चाहिए?
English explanation
O ten-headed Ravana, should I suffer such a plight while you are still alive?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तोहि | तुम्हारे | you |
| जिअत | जीते-जी | while alive |
| दसकंधर | हे दस सिर वाले रावण | O ten-headed Ravana |
| मोरि | मेरी | my |
| कि | क्या | should; is it that |
| असि | ऐसी | such |
| गति | दशा, दुर्दशा | plight |
| होइ | हो | befall |
| ख | पद्य-संदर्भ का खंड-चिह्न | verse-reference section marker |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 21 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 3.21
- सहायक विषय
- शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, श्रीसीताजीका अग्रि-प्रवेश और माया-सीता
- मुद्रित पृष्ठ
- 649, 650
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