अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
मूल पाठ
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।
स्रोत अभिलेख 3.29 · पुस्तक पृ. 658, 660
भावार्थ
मूल पाठ के बादयह सुनते ही गीध क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला—रावण! मेरी सिखावन सुन। जानकीजीको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले! ऐसा होगा कि —॥ ८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 659 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
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2 तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 659
- सहायक विषय
- जटायु-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 658, 660
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