अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दसीताजीको फिर रथपर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावलीके साथ चला, उसे भय कम न था। सीताजी आकाशमें विलाप करती हुई जा रही हैं। मानो व्याधके वशमें पड़ी हुई (जालमें फँसी हुई) कोई भयभीत हिरनी हो!॥ १२॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 660 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।
स्रोत अभिलेख 3.29 · पुस्तक पृ. 658, 660
शब्द-दर-शब्द अर्थ
शब्दार्थ उपलब्ध नहींइस पद के शब्दार्थ अभी उपलब्ध नहीं हैं। ऊपर का भावार्थ और मूल पाठ पढ़ें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
2 करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 660
- सहायक विषय
- जटायु-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 658, 660
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।