अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
मूल पाठ
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।
स्रोत अभिलेख 3.29 · पुस्तक पृ. 658, 660
भावार्थ
मूल पाठ के बादतब खिसियाये हुए रावणने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायुके पंख काट डाले। पक्षी (जटायु) श्रीरामजीकी अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ११॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 660 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
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2 काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 660
- सहायक विषय
- जटायु-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 658, 660
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