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मूल पाठ · शब्दार्थ · भावार्थ

लङ्काकाण्ड 6.81

अंश 82 / 122
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चौपाई

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छंद और दोहा · पृ. 852

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क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं।

मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥

मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।

चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिंखल छीजहीं॥

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।

प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥

धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।

जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।

रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥ ८१॥

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