लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।
मूल पाठ
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।
दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ।।
स्रोत अभिलेख 6.93 · पुस्तक पृ. 866, 867
भावार्थ
मूल पाठ के बादरणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया। एक दण्ड (घड़ी) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 866 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।
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2 दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.93
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 866
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 866, 867
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