लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।
मूल पाठ
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।
दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे।।
स्रोत अभिलेख 6.92 · पुस्तक पृ. 865, 866
भावार्थ
मूल पाठ के बादरावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 865 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।
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2 दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.92
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 865
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 865, 866
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