लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।।
मूल पाठ
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।।
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए।।
स्रोत अभिलेख 6.92 · पुस्तक पृ. 865, 866
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[सिर और हाथ] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया। इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 865 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने।।
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2 प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.92
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 865
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 865, 866
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