अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[वह बोला—] हे सीते पुत्री! भय मत कर। मैं इस राक्षसका नाश करूँगा। [यह कहकर] वह पक्षी क्रोधमें भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वतकी ओर वज्र छूटता हो॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 659 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।
स्रोत अभिलेख 3.29 · पुस्तक पृ. 658, 660
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
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2 धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 659
- सहायक विषय
- जटायु-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 658, 660
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।